LetraPathar Ke Khuda

Jagjit Singh

Última actualización realizada el: 21 de julio de 2017
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पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसां पाए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं

बुतख़ाना समझते हो जिसको, पूछो ना वहाँ क्या हालत है हम लोग वहीँ से लौटे हैं, बस शुक्र करो लौट आए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसां पाए हैं हम सोच रहे हैं मुद्दत से, अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं, शहरों में ग़मों के साए हैं होंठों पे तबत्सुम हल्का सा, आँखों में नमीं सी ए फाकीर* हम अहल-ए-मोहब्बत पर अक्सर, ऐसे भी ज़माने आए हैं तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसां पाए हैं

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